सर्वाइवल रेट बढ़ रही और बर्थ रेट भी, लेकसिटी में श्वावों के कुनबे की बढ़ रही तादाद

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बढ़ती तादाद से बेकाबू होकर अब पालतू जानवरों को भी काट रहे, पशु चिकित्सालय पहुंच रहे रोज औसतन पांच मामले

उदयपुर. लेकसिटी में स्ट्रीट डॉग्स इस कदर बेकाबू हो गए हैं कि वे इंसानों के साथ ही जानवरों पर भी लगातार हमले कर रहे हैं। प्रतिदिन औसतन पांच दुधारू और पालतू जानवरों को अस्पताल में एंटी रेबीज वैक्सीन लगानी पड़ रही है। ये हालात श्वानों की बेकाबू होती तादाद के कारण बन रहे हैं।
जानकार बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में शहर में स्ट्रीट डॉग्स की सर्वाइवल रेट काफी बढ़ गई है। चूंकि पिल्लों को पालने, श्वानों के घायल या बीमार होने की स्थिति में उन्हें अस्पताल तक पहुंचाने से उनकी मृत्यु दर घट रही है। पशु चिकित्सकों का कहना है कि शहरी लोगों में संवेदनशीलता और जानवरों को बचाने की जागरूकता बढऩे से अब 50 प्रतिशत से ज्यादा श्वानों के पिल्ले सर्वाइव करने लगे हैं। पहले बहुत ज्यादा तादाद में श्वान भूख या बीमारी से मर जाते थे, लेकिन अब उनकी संख्या बढ़ रही है। शहर में करीब आठ से दस हजार की तादाद में श्वान हैं, जो अब पशुओं को भी काट रहे हैं। गाय, बैल, बकरियों व अन्य पालतू जानवरों को लेकर पशुपालक चिकित्सालय पहुंच रहे हैं। उन्हें पोस्ट बाइट एंटी रेबीज वैक्सीन निशुल्क लगाई जा रही है।
– 65 दिन में आठ बच्चे
श्वानों की प्रजाति का साल में दो बार सितम्बर-अक्टूबर और जनवरी-फरवरी में प्रजनन काल आता है। एक मादा श्वान 60-65 दिन में पांच से आठ तक बच्चे देती है। पिल्लों में मादा बड़ी होकर डेढ़ साल बाद ही मां बनन सकती है। एक श्वान औसतन 15 साल की उम्र तक जी सकता है।
– इनका भी बदल रहा बर्ताव
शहरी क्षेत्र में श्वान ही नहीं, बंदर, साण्ड, कॉमन लंगूर और लावारिस गायों के बर्ताव में भी लगातार बदलाव आ रहा है। इंसानी आबादी इलाके में खाने-पीने की चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाने पर उनका ध्यान भोजन की चिंता से भटककर दूसरे तरह के प्राकृतिक व्यवहार पर केन्द्रित हो जाता है। बंदरों के भी नोंचने, काटने की कुछ मामले सामने आते हैं, जिनसे रेबीज होने की आशंकाएं होती हैं।
– मिशन की तरह लेना होगा
शहर में श्वानों की तादाद बढऩा चिंताजनक है। इनके नसबंदी कार्यक्रम को मिशन की तरह लेना होगा, तभी हर गली-मोहल्ले में इन्हें नियंत्रण किया जा सकेगा।
डॉ. कमरेन्द्र सिंह, पशु चिकित्सक

Patrika

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