मंदिर की सम्पत्ति की तोड़-फोड़ नहीं करें मूल स्वरूप में देवस्थान को दें

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अपर जिला एवं सेशन कोर्ट – श्री मीठारामजी मंदिर नृसिंह द्वार

भुवनेश पंड्या
उदयपुर. रावजी का हाटा स्थित श्री मीठारामजी मंदिर नृसिंह द्वार को लेकर सोमवार को एडीजे कोर्ट तीन की पिठासीन अधिकारी मीनाक्षी जैन ने महन्त रामचन्द्रदास और चेला चतुर्भुज दास साधु को फैसला सुनाया कि वे मंदिर की सम्पत्ति की तोड़-फोड़ नहीं करें, यदि कोई बदलाव किया है तो उसे मूल स्वरूप में करने के बाद इसे देवस्थान विभाग को सुपुर्द कर दें। राजस्थान सरकार, सहायक आयुक्त देवस्थान जगदीश चौक और आयुक्त देवस्थान विभाग ने रावजी का हाटा स्थित मंदिर श्री मीठारामजी नृसिंह द्वार के महन्त रामचन्द्र दास और चेला चतुर्भुज दास साधु के खिलाफ 15 मई 2000 को अस्थाई निषेधाज्ञा व कब्जे सुधा मंदिर की सम्पदा को लेकर अदालत में पेश किया था। इसमें बताया कि यह मंदिर एव उसकी चल अचल सम्पत्ति राज्य सरकार की है। मंदिर की सेवा पूजा के लिए मेवाड़ राज्य द्वारा महन्त की नियुक्ति की जाती रही है। उनकी मृत्यु के बाद चेले को महन्त बनाया जाता है। प्रतिवादी मंदिर की सम्पत्ति को तोड़-फोड़ कर परिवर्तन व परिवर्धन कर रहे थे। तीन बार नोटिस के बाद भी उन्होंने तोड़-फोड़ बंद नहीं की। उन्होंने निर्माण से जुड़ी कोई स्वीकृति सरकार से नहीं ली है। इसलिए देवस्थान विभाग मंदिर पर कब्जे का अधिकारी है। यहां तक भगवान के जेवरात व चल-अचल सम्पत्ति को खुद की बता रहे हैं, इस प्रार्थना पत्र पर बहस के दौरान सरकार की ओर से लोक अभियोजक संदीप दहिया ने कहा कि मंदिर की अचल सम्पत्ति को बगैर देवस्थान की स्वीकृति के तोड़-फोड़ कर रहा है, जेवरात को अपनी बताते हैं, जबकि वास्तव में ये गलत है और सम्पत्ति देवस्थान की है। मूर्ति को भी अन्यत्र स्थानान्तरण करना चाहता है। प्रतिवादी वकील ने कहा कि मंदिर कभी देवस्थान विभाग का था ही नहीं, इसे निजी सम्पत्ति बताई गई। दोनों पक्षों की बहस के बाद पिठासीन अधिकारी मीनाक्षी जैन ने महन्त रामचन्द्रदास व चेला चतुर्भुजदास के खिलाफ सरकार की ओर से पेश निषेधाज्ञा व कब्जा सुपुर्दगी का प्रार्थना पत्र स्वीकार कर प्रतिवादी को आदेश दिकए कि तीन माह में जेवर, बर्तन व चल अचल सम्पत्ति देवस्थान को सुपुर्द की जाए, मूर्तियों को अन्यत्र नहीं ले जाया जाए,चल अचल सम्पदा पर निर्माण है तो उसे प्रतिवादी अपने खर्च पर मूल स्वरूप में लाकर देवस्थान को दे।

Patrika

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