प्रताप के विजयोत्सव का गवाह है मेनार का गेर नृत्य

खरसाण गांव के चारभुजा मन्दिर का शिलालेख बयां करता है यश-कीर्ति, मेनारिया समाज के पुरुष-महिलाएं सज-धज बंदूकों, तीर-तलवार लेकर करते हैं नृत्य

उदयपुर. मेनार अपने कुदरती खूबसूरती के लिए जगत प्रसिद्ध तो है ही, यहां का कण-कण इतिहास का भी यशोगान करता है। यह मेवाड़ के सूर्यवंशी जननायक राणा प्रताप के विजयोत्सव का भी साक्षी है। उदयपुर से चित्तौडग़ढ़ की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग-76 पर बसा सदियों पुराने गांव मेनार में होली के बाद चैत्र कृष्ण द्वितीया को जमरा बीज पर गेर नृत्य बड़े उल्लास से मनाया जाता है। इस आयोजन से पहले गांव के गौरवपूर्ण इतिहास को पढ़ा जाता है। उत्सव पर महाराणा उदयसिंह, महाराणा प्रताप व अमरसिंह के शासनकाल में हुआ मेवाड़-मुगल संघर्ष जीवंत हो उठता है।
तक्षशिला विद्यापीठ संस्थान के इतिहास विभाग की प्रो. मीनाक्षी मेनारिया बताती हैं कि खरसाण के चारभुजा मन्दिर के मुख्य द्वारा के छबड़े पर उत्कीर्ण हल्दीघाटी के युद्ध के समय का शिलालेख इस परम्परा का ऐतिहासिक प्रमाण है कि मेवाड़-मुगल संघर्षकाल में खरसाण, मेनार, वल्लभनगर (ऊंटाला), ताणा एवं मोही में मुगल थानों को उठाने में स्थानीय जन समुदाय की खास भूमिका थी। मुगलकालीन ग्रंथों और मेवाड़ की ख्यातों के साथ यहां उपलब्ध शिलालेख से यह जाहिर होता है। युद्ध में प्रताप की जीत पर मनाए विजयोत्सव की परम्परा आज भी होली मिलन के रूप में जिन्दा है। इस नृत्य के पीछे प्रताप के मुगल विरोधी स्वतन्त्रता संग्राम में तत्कालीन समस्त वर्गों क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, आदिवासी एवं अन्य कृषक व कार्मिक जातियों के सक्रिय सहयोग का सजीव चित्रण होता है। इतिहासकार डॉ. गिरीश माथुर ने बताया कि जमरा बीज के गैर नृत्य की पृष्ठभूमि में मेवाड़-मुगल संघर्ष में महाराणा प्रताप के समय में स्थानीय मेनारिया ब्राह्मणों के साथ स्थानीय जातियों के सक्रिय योगदान का इतिहास छिपा है।
समाज की महिलाओं के वीररस भरे गीतों के साथ तलवारों, बन्दूकों एवं अन्य रणभेरीयुक्त थाप ढोल-नगाड़ों आदि के संग सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित होता है। मेनारिया जाति के पुरूष-महिलाएं पारम्परिक वेश-भूषा के साथ सजधज कर इसमें शामिल होते हैं। गैर नृत्य में पुरुषों के पांच दल कसूमल पाग, सफेद धोती-कुर्ता पहने आधुनिक ओलम्पिक की तर्ज पर गांव के पांचों मार्गों से मशालचियों की अगुवाई में औंकारेश्वर चौराहे पर बिछी लाल जाजम पर कसूबें की रस्म पूरी करते हैं, तब नृत्य प्रारम्भ होता है।
– शत्रु के बीज के खात्मे का उत्सव है जमरा बीज
इतिहासकार डॉ. जी.एल. मेनारिया ने बताया कि खरसाण का शिलालेख वि.सं. 1632 शक वर्ष 1498 ई. सन् 1576 के हल्दीघाटी युद्ध के वर्ष का है। इसमें उल्लेख है कि प्रताप के साथ स्थानीय मेहता जगन्नाथ, कचरावत लक्ष्मीदास, रघुनाथ, विश्वनाथ, देवदत्त, हरदास समस्त समाजजनों का योगदान था। प्रताप के विजयोत्सव में स्थानीय जननायकों की उपस्थिति का वर्णन तत्कालीन विद्वान नरभट ने उत्कीर्ण इस प्रशस्ति में किया, जो इस तथ्य का पुरातात्विक प्रमाण है कि प्रताप ने अकबर की सैन्य शक्ति एवं उसके साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के विरुद्ध जन सहयोग लिया। हल्दीघाटी युद्ध के बाद आयोज्य इस विजयोत्सव में गोप-गोपियां, संत, राजा रानी व प्रजाजन्य शत्रु मानमर्दन, शत्रु के मर्म, शत्रु के दमन, शत्रु के गर्व के दमन के साथ शत्रु के गर्भ में बचे हुए शत्रुता के भ्रूण (बीज) को समूल नष्ट किया। यह जमरा बीज इसी विजयोत्सव का प्रतीक है।
– आठवीं सदी से है ब्राह्मणों के क्षात्रधर्म निर्वहन का इतिहास
प्रो. डॉ. अजातशत्रु ने बताया कि यों तो बाप्पा रावल व खुमाण रावल के समय अरबों व तुर्की आक्रमणों के प्रतिरोध में मेनारिया, पालीवाल व नागदा ब्राह्मणों के क्षात्रधर्म निर्वहन की परम्परा का इतिहास 8वीं सदी से ही मिलता है। मेवाड़ की राजधानी नागदा नगर पर तुर्की आक्रमणों के दौरान जैत्रसिंह ने सुल्तान इल्तुतमिश के विरुद्ध नागदा व भूताला के निकट हुए निर्णायक युद्ध में तलारक्ष उद्धरण एवं उसके पुत्र योगराज ने तुर्कों से लड़ते हुए शहादत दी। इस घटना का उल्लेख चीरवा ग्राम की 1213 ई. रावल समरसिंह कालीन प्रशस्ति में हुआ है। प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि मेवाड़ के गुहिल नरेशों के समय चीरवा के उद्धरण व पुत्र योगराज तथा प्रपौत्र नागदा, चित्तौड़ एवं कोटड़ा (बांसवाड़ा-डूंगरपुर) के तलारक्ष थे। उन्होंने मेवाड़ के निर्णायक युद्ध में भाग लिया। नागदा, चित्तौड़ व कोटड़ा में तलारक्ष रहते हुए चीरवा के इस परिवार के प्रमुख राज्य की रक्षा करते वीरगति को प्राप्त हुए।

Patrika

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