कोरोना से आज दुनिया खतरे में, कल जल संकट बन सकता है चुनौती

– विश्व जल दिवस विशेष- पानी को बर्बाद होने से बचाएं, समय रहते हुए संभलें, जल संरक्षण करने की आवश्यकता

उदयपुर. आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस को लेकर चिंतित है और उससे बचाव के उपाय ढूंढ रही है। दरअसल, ये वायरस प्रकृति से खिलवाड़ करने का उदाहरण है जो इंसानों पर भारी पड़ रहा है। प्रकृति की हर एक चीज चाहे वह भूमि हो, पेड़ हों, प्राणी हों या फिर जल सभी का महत्व हमें समझना होगा और प्रकृति को उसे उसी के अनुरूप चलते रहने देना होगा। हमारा जीवन जल पर निर्भर करता है। ऐसे में जल का संरक्षण करना और उसका दुरुपयोग करने से बचाने के लिए हमें अब उसी गंभीरता से कदम उठाने होंगे जितना हम अभी कोरोना के लिए उठा रहे हैं।

दुनिया के सामने जल संरक्षण का उदाहरण पेश किया मेवाड़ ने

इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, मेवाड़ के महाराणाओं ने जल संरक्षण के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी का उदाहरण है कि 8वीं शताब्दी में मेवाड़ में बांध बन गए थे। इसके अभिलेखीय प्रमाण हैं। मेवाड़ के हर महाराणा ने राजा मान से लेकर महाराणा भूपाल सिंह तक ने तालाब बनावाए। महाराणा प्रताप ने पानी बचाने की बात कही थी। राजाओं ने तालाब बनवाए तो रानियों ने बावडिय़ां बनवाई। मेवाड़ में शुरुआत से ही जल स्त्रोतों की कोई कमी नहीं रही है। प्राचीनकाल से ही यहां कई झील, नदी, तालाब, बावडिय़ां, कुएं आदि का निर्माण होता रहा ताकि जल को बचाया जा सके। आपस में झीलों को जोडऩे का कॉन्सेप्ट दुनिया को मेवाड़ ने ही दिया। पानी को ऊपर चढ़ाने की भी तकनीक थी रेहट के जरिये। जल संसाधन, जल यंत्र, जलधारा, नदियां, नाले सभी से मेवाड़ समृद्ध था। पानी बचाने, सिंचाने, ऊपर चढ़ाने की तकनीक थी। पानी पर पुस्तक लिखी गई वह है विश्व वल्लभ।

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इसलिए मनाया जाता है

1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में विश्व जल दिवस की पहल की गई थी। इसके परिणामस्वरूप 1993 में 22 मार्च को पहली बार विश्व जल दिवस का आयोजन किया गयाद्य इसके बाद से हर वर्ष लोगों के बीच जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। एक रिपोर्ट में भारत को चेतावनी दी गई है कि यदि भूजल का दोहन नहीं रूका तो देश को बड़े जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। 75 फीसदी घरों में पीने के साफ पानी की पहुंच ही नहीं है।




Patrika

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