आवरगढ़ की पहाडिय़ों में होली दहन के बाद जलती है गांवों में होली

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गायब हुए फागोत्सव केगीत, औपचारिता में बदल रहा होली पर्व

मदन सिंह राणावत / झाडोल. उपखण्ड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर दमाणा ग्राम पंचायत में आवरगढ की पहाडियों में सबसे पहले वानर टुक पर होली का दहन होता है। पुजारी एवं क्षेत्र के शिवभक्तों ने बताया कि बरसों से यह परम्परा चली आ रही है। ग्रामीण इस होली दहन के दर्शन करने के बाद ही रात्रि में अपने गांवों की होली का दहन करते है। हल्दी घाटी युद्व के पश्चात झाड़ोल जागीर मे स्थित पहाड़ी पर जहां आवरगढ का किला स्थित है वही पर महाराणा प्रताप ने होली जलाई थी। उसी समय से पूरे झाड़ोल मे सबसे पहले इसी जगह होलिका दहन होता है।आज भी प्रतिवर्ष महाराणा प्रताप के अनुयायी होली के अवसर पर पहाड़ी पर एकत्रित होते है एवं होलिका दहन करते है। पहाड़ी से होली दहन की अग्निी करीब 15 किलोमीटर दूर-स्थित गांवों में दिखाई देती है, इसके बाद गांवों में होलिका दहन किया जाता है।

फाग के गीत हुए कम

रंगों का पर्व होली विभिन्न क्षेत्रों में बदलते परिवेश में अब होली की परम्पराओं पर आधुनिकता हावी हो रही है होली पर्व की मिठास कम होती जा रही है। पूर्व में जहां फाग माह के शुभारंभ के साथ ही गली-मोहल्लें में फाग के मस्ती भरे गीत होते थे। युवा टोलिया बनाकर रात के समय चंग की थाप पर फाग के गीत गाते थे,लेकिन अब फाग के गीत गायब से होते जा रहे है। अब यह पर्व उत्साह की जगह औपचारिकता में बदल रहा है ।

Patrika

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