जानिये हिन्दू विवाह के सात फेरे और सात वचनों का मतलब !!

 

भारतीय विवाह में विवाह की परंपराओं में सात फेरों का भी एक चलन है. जो सबसे मुख्य रस्म होती है. हिन्दू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्म पूर्ण होती है. विवाह के दौरान पंडित इन 7 वचनों का संस्कृत भाषा में बोलते हैं, लेकिन आज हम आपको उन्हीं सातों फेरों का हिंदी अनुदार करके बताने जा रहे हैं. इससे आप विवाह के दौरान लिए जाने वाले 7 फेरों का मतलब और महत्व जान पाएंगे.

  • पहला वचन :- तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
    वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

यदि आप कोई व्रत उपवास, अन्य धार्मिक कार्य या तीर्थयात्रा पर जाएँगे, तो मुझे भी अपने साथ ले जाएँ. यदि आप इसे स्वीकार करते है तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.

  • दूसरा वचन :-पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
                        वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!

आप अपने माता पिता की तरह ही मेरे माता पिता का भी सम्मान करेंगे. और परिवार की मर्यादा का पालन करेंगे. यदि आप इसे स्वीकार करते है तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.

  • तीसरा वचन :-जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
    वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

आप जीवन की तीनो अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे. यदि आप इसे स्वीकार करते है तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.

  • चौथा वचन :- कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
    वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

अब हम विवाह बँधन में बंध रहे है, तो भविष्य में परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की ज़िम्मेदारी आपके कंधो पर है. यदि आप इसे स्वीकार करते है तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.

  • पाँचवा वचन :- स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
    वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

अपने घर के कार्यों में विवाह आदि लेन देन और अन्य किसी हेतु ख़र्च करते समय यदि आप मेरी भी राय लिया करेंगे तो मैं आपके वामाँग में आना स्वीकार करती हूँ.

  • छठा वचन :- न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
    वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

यदि मैं कभी सहेलियों के साथ रहूँ, तो आप सबके सामने कभी मेरा अपमान नहीं करेंगे. जुआँ या किसी भी तरह की बुराइयाँ अपने आप से दूर रखेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.

  • सातवाँ वचन :- परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
    वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

आप पराई स्त्रियों को माँ समान समझेंगे और पति पत्नी के आपसी प्रेम के बीच अन्य किसी को भी नहीं आने देंगे. यदि आप ये वचन दे तो ही मैं आपके वामाँग में आना स्वीकार करती हूँ.